जानवर

तुम ईसे तरक्की कहते हो
पर होश तो कहीं, दिखायी नहीं देता
और अंधी-भक्ती को, तुम प्रेम कहते हो
पता है, जानवर और तुम में क्या फर्क है
बस यही कि तुम अपने आप को जानवर नहीं मानते
और ईसी लिए तुम कुछ जान नहीं पाते और तुम्हे मिलता नहीं, "इंसां का जन्म"

पाणी के निचे भी, एक दुनियां है
पर सूरज की रोशनी, नहीं जाती वहां तक
ईसीलिए रंगी-बिरंगी है

पर तुम तो अंधेरे में नहीं हो
और देख सकते हो, अपना वजुद
जो है न के बराबर

पर तुम देखते कब हो
राजी कब होते हो, गुम हुयी निंद से
और गम करते हो
मांगते हो गोलीयां, निंद की
निढाल नहीं हो पाते
जब कि अस्तित्व दे रहा है

पर तुम लेना नहीं चाहते
और देना नहीं चाहते, "ध्यान"
जबकि "ज्ञा/जान" तुम्हे कुछ भी नहीं है
और तुम ईसे तरक्की कहते हो